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अजय देवगन के पिता वीरू देवगन नहीं रहे, दो बाइक वाला स्टंट उन्हीं की देन थी

अजय देवगन के पिता वीरू देवगन नहीं रहे, दो बाइक वाला स्टंट उन्हीं की देन थी

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उस लड़के का नाम विशाल था. शर्मीले से उस लड़के को अजय देवगन बनाने वाला इंसान 27 मई को इस दुनिया से गुज़र गया. यहां बात अजय के पिता वीरू देवगन की हो रही है. वो 77 बरस के थे. हिंदी सिनेमा के सबसे बड़े, सबसे सफल स्टंट डायरेक्टरों में से एक. वीरू ने डेढ़ सौ से ज्यादा फिल्मों में स्टंट डायरेक्ट किया. हैरत नहीं कि महेश भट्ट की ‘जख़्म’ से पहले लोग अजय देवगन को ऐक्शन हीरो कहते थे.

कसम खाई, बड़े बेटे को हीरो बनाऊंगा

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ये 1957 की बात है, जिस साल गुरु दत्त की प्यासा रिलीज हुई थी. देश के कोने-कोने से रोज़ाना दर्ज़नों लड़के बंबई आते. सबको हीरो बनना था. ऐसा ही एक लड़का था. अमृतसर में रहता. एक दिन दोस्तों ने तय किया और घर से भाग निकले. पंजाब से फ्रंटियर मेल आती थी उन दिनों, चढ़ गए. टिकट लिया नहीं. चेकिंग हुई, तो पकड़े गए. हफ़्ते भर जेल में रहना पड़ा. बंबई तब भी निर्मम थी. भूख-प्यास. सिर पर छत नदारद. साथ आए दोस्त हिम्मत हारकर अमृतसर लौट गए. बस एक नहीं लौटा. उसका नाम- वीरू देवगन. दाल-रोटी चलाने को वीरू टैक्सियां साफ करने लगे. कुछ बढ़ई का काम भी किया. कुछ हालत सुधरी, तो फिर फिल्मों में आने की चाहत ने जोर मारा. फिल्म स्टूडियो के फेरे लगाने लगे. सोचा था, हीरो बनेंगे. मगर यहां मक्खन चेहरे वालों की पूछ थी. वीरू को लगा, हीरो बनने के रेस में उनका नंबर नहीं आने का. कुछ फिल्मों में छोटा रोल किया भी. मगर मन लायक काम नहीं था. यूं एक काम से दूसरा काम, ट्रायल-ऐरर करते करते आख़िर ऐक्शन को खोज निकाला. और फिर यही करते रह गए. खुद का हीरो बनना रह गया था. उस टीस को ये कहकर दवा दी कि मेरा सबसे बड़ा बेटा बनेगा हीरो. मतलब पैदा होने से पहले ही अजय देवगन हीरो बन चुके थे.

अजय को हीरो बनाने के लिए वीरू की लगन ज्यादा थी

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वीरू ने खुद से किया वादा निभाया. अजय ने क्या मेहनत की हीरो बनने के लिए, जितनी वीरू ने की उन्हें हीरो बनाने के लिए. छुटपन से ही काम सिखाया. फिल्मों का, सेट का माहौल. डांस सीखना. जिम करवाना. जुबान साफ करने को उर्दू. घुड़सवारी. ऐक्शन का ऐ से न तक. हीरो बनने से पहले ही अजय हीरो मटीरियल थे. और फिर जब कुकु कोहली ने ‘फिल्म और कांटे’ बनाने की ठानी, तो कुकु और वीरू को अजय के किरदार के लिए अजय से बेहतर कोई लगा ही नहीं.

…और अजय देवगन की एंट्री का वो सीन

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जब-जब अजय देवगन को याद किया जाएगा, उनकी पहली फिल्म ‘फूल और कांटे’ का वो ऐक्शन सीन भी जगह पाएगा. दो चलती हुई बाइक्स. उनपर पैर टिकाए एंट्री करते अजय देवगन. लेदर जैकेट, काला चश्मा. इसी सीन में सड़क पर एक डिवाइडर आता है और चलती बाइक पर बैंलेस्ड अजय के पांव बिल्कुल सीध में फैल जाते हैं. लोगों ने फटी आंखों से ये एंट्री देखी. न कोई स्पेशल इफेक्ट, न बॉडी डबल, न कंप्यूटर ग्राफिक्स. ये बेहद मुश्किल सीन था. मगर वीरू ने अजय से बड़ी तैयारियां करवाई थीं. सीन जैसा सोचा गया था, शायद उससे भी अच्छा हो गया.

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जिस दौर में वो फिल्म आई, उस दौर में गांवों के लड़के फिल्म देखने की कसर उस फिल्म से जुड़ी किताब पढ़कर पूरी करते थे. मटमैले-धूसर से पन्नों वाली किताब. जिसमें फिल्म का हर सीन छपा होता. मय डायलॉग. मैंने अपने छोटे मामा के बक्से में ‘फूल और कांटे’ की वो किताब देखी है. सहेजकर रखी उस किताब को पढ़ा भी है. वीरू अपने बेटे की लॉन्चिंग को यादगार बनाना चाहते थे. ऐसी एंट्री कि कोई हरगिज़ न भूल पाए. ये ख्वाहिश भरपूर मुकम्मल हुई.

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वीरू ने अपने बेटे के लिए एक फिल्म भी डायरेक्ट की- हिंदुस्तान की कसम. ये अपने जमाने की बड़ी महंगी फिल्म थी. हालांकि फिल्म चली नहीं. मगर देखने वालों ने कहा, फिल्म भले बेकार हो मगर स्टंट अच्छे थे.
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