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हफ्ते में 70 घंटे काम…नारायण मूर्ति की सलाह पर आया युवा लेखक का बयान, बताया- देश में पहले ये समस्याएं हों दूर


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Narayana Murthy: देशभर में इन दिनों एक नई बहस छिड़ गई है। ये बहस देश के बड़े उद्योगपति और IT कंपनी इंफोसिस के फाउंडर एनआर नारायण मूर्ति की एक सलाह के बाद से ही शुरू हो गई है, नारायण का कहना है कि युवाओं को अपनी उत्पादकता बढ़ाने के लिए हफ्ते में 70 घंटे काम करना चाहिए है क्योंकि भारत की प्रोडक्टिविटी दुनिया में सबसे कम है। इसी को लेकर युवा लेखिका गुरमनगीत कौर पांडे ने अपनी प्रतिक्रिया दी है, उनका मानना है कि हमें देश में घंटो में वृद्धि को लेकर नहीं कई और भी चीजे हैं जिसे देश को करने की जरूरत है, तो आईये जानते हैं ऐसे और क्या बिंदू हो सकते हैं जिससे देश बढ़ोतरी की ओर जा सकता है…

भारत में कई आवश्यकता की है जरूरत
भारत की बात की जाए तो यहां काम करने वालो की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं होती, यहां के मजदूर और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले लोग दोनों ही लोग काफी कम सैलरी पर 11 से 12 घंटे काम करते हैं, राजधानी दिल्ली में रहने वाले छोटे श्रमिकों का उदाहरण देकर ये समझाया गया है कि कैसे 4 से 5 मजदूर छोटी-छोटी झुग्गी-झोपड़ी में बेहद खराब स्थिति में रहते हैं ऐसे लोगों पर भी ध्यान केंद्रित करने के आवश्यकता है, वहीं, कंपनियों में कर्मचारी ओवरटाइम करते हैं और फिर भी उन्हें इतना सैलरी नहीं मिलती कि रोजमर्रा की जरूरतें भी पूरी हो सके। अगर हम देखें तो हफ्ते में 6 दिन जो व्यक्ति काम करता है वह हर रोज 12 घंटे काम करता है और अगर 12 को 6 से गुणा करके देखें तो वैसे ही एक साधारण आदमी 72 घंटे काम कर ही रहा है।

भारत सबसे कम उत्पादकता दर वाला देश है। यह साफ है कि काम के घंटों का उत्पादकता से कोई लेना-देना नहीं है फिर भी उत्पादकता में वृद्धि के लिए बड़े नीतिगत सुधार, एक मजबूत मानव पूंजी आधार का निर्माण और श्रमिकों के मानसिक और शारीरिक कल्याण में सुधार जरूर होने चाहिए, जिससे काम करने वाले लोगों को जो दिक्कतें अभी झेलनी पड़ती है वो ना झेलनी पड़े, आइए अब जापान और जर्मनी के मामलों पर एक नजर डालते हैं।

‘विदेशों में जो तकनीक है वो भारत में हो इस्तेमाल’
जापान ने सूती कपड़ा और जहाज निर्माण जैसे बड़ें उद्योगों की एक श्रृंखला स्थापित की और ये राज्य के स्वामित्व वाले थे। इनमें से कई काम फेल हुए, पर इसके बावजूद इन कामों ने कारीगरों और प्रबंधकों को तैयार किया जिससे निजी क्षेत्र का एक मजबूत आधार बनाने में मदद मिली। साथ में घरेलू उत्पादन को भी बढ़ावा दिया गया और आयात पर शुल्क बढ़ाये गए। इसके बाद 1914 तक जापान का सूती कपड़े का काम इतना सफल हो पाया।

जापान और जर्मन में 40 घंटे किया जाता है काम
विश्व युद्ध की वजह से जर्मन ने काफी तबाही झेली, इसके बाद भी उसकी अर्थव्यवस्था की वापसी को ‘जर्मन आर्थिक’ चमत्कार कहा जाता है। यहां भी हम राज्य की महत्वपूर्ण भूमिका देख सकते हैं। जर्मनी ने एक सामाजिक बाज़ार अर्थव्यवस्था का निर्माण किया जिसने मुक्त बाज़ार पूंजीवाद दोनों को बढ़ावा दिया और साथ ही सरकार को सामाजिक नीतियां बनाने की अनुमति दी। सामाजिक बीमा योजनाओं के नेटवर्क के कारण श्रमिकों को बीमारी और बेरोजगारी से बचाया गया।

जर्मनी में दुर्घटना बीमा भी दिया जाता है जो ऑफिस दुर्घटनाओं के समय मदद करता है, वहीं कम सैलरी वाले परिवारों को घर भी दिए जाते हैं। जर्मनी में बच्चो और परिवार के लिए कई काम किए जाते हैं। श्रमिकों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए ये सामाजिक सुरक्षा देना बेहद जरूरी माना जाता है। बता दें, जर्मनी और जापान दोनों में, एक दिन में सिर्फ 8 घंटे काम किया जाता है और पूरे हफ्ते केवल 40 घंटे लोग काम करते हैं।


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